February 26, 2026
चतरा विमान हादसे में चंदवा के संजय प्रसाद

कभी-कभी जिंदगी इंसान को ऐसी परीक्षा में डाल देती है, जहां उम्मीद और दर्द साथ-साथ चलते हैं। झारखंड के चंदवा निवासी संजय प्रसाद की कहानी भी कुछ ऐसी ही है—एक ऐसी कहानी, जिसमें एक हादसे से बचने की जंग लड़ रहे व्यक्ति की जिंदगी, दूसरे हादसे में हमेशा के लिए हार गई। यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक परिवार के सपनों, संघर्ष और उम्मीदों के टूटने की कहानी है।

पहला हादसा: जब आग ने सब कुछ छीन लिया

कुछ दिन पहले संजय प्रसाद के होटल में अचानक शॉर्ट सर्किट से भीषण आग लग गई। आग इतनी भयानक थी कि देखते ही देखते होटल जलकर राख हो गया। इस हादसे में संजय खुद भी बुरी तरह झुलस गए—करीब 65 प्रतिशत तक।
उनका शरीर गंभीर रूप से घायल था, दर्द असहनीय था, लेकिन परिवार के दिल में उम्मीद अभी भी जिंदा थी कि सही इलाज से उन्हें बचाया जा सकता है।

यह हादसा सिर्फ एक व्यवसाय के खत्म होने का नहीं था, बल्कि एक परिवार के सहारे के टूटने की शुरुआत थी।

उम्मीद की उड़ान, जो कभी मंजिल तक नहीं पहुंची

संजय की हालत इतनी गंभीर थी कि उन्हें सड़क मार्ग से ले जाना संभव नहीं था। डॉक्टरों ने सलाह दी कि उन्हें तुरंत दिल्ली के किसी बड़े अस्पताल में ले जाया जाए, जहां बेहतर इलाज संभव हो सके।

परिवार ने हार नहीं मानी। उन्होंने रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों से मदद मांगी। लाखों रुपये उधार लिए गए।
करीब 7.5 लाख रुपये खर्च कर एयर एम्बुलेंस बुक की गई, ताकि संजय की जिंदगी बचाई जा सके। यह सिर्फ एक यात्रा नहीं थी—यह उम्मीदों की उड़ान थी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

दूसरा हादसा: जब उम्मीदें आसमान में ही टूट गईं

एयर एम्बुलेंस रांची से दिल्ली के लिए उड़ान भर चुकी थी। परिवार के लोग दुआ कर रहे थे कि संजय सुरक्षित दिल्ली पहुंच जाएं और उनका इलाज शुरू हो सके। लेकिन रास्ते में ही विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। यह खबर सुनते ही परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई।

संजय के बड़े भाई विजय शाह ने भारी दिल से बताया,
“हम उन्हें रांची एयरपोर्ट पर छोड़कर घर पहुंचे ही थे कि टीवी पर दुर्घटना की खबर देखी। कुछ समझ ही नहीं आया। पल भर में सब कुछ खत्म हो गया।”

इस हादसे में सिर्फ संजय ही नहीं, बल्कि उनकी पत्नी अर्चना की भी मृत्यु हो गई।
एक ही पल में दो जिंदगियां खत्म हो गईं—और पीछे रह गए दो मासूम बच्चे, जो अब अपने माता-पिता के बिना जिंदगी जीने को मजबूर हैं।

दोहरी त्रासदी: जब परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़

पहले होटल जल गया, फिर जिंदगी बचाने की कोशिश में एयर एम्बुलेंस हादसे का शिकार हो गई। परिवार ने जो पैसे इलाज के लिए उधार लिए थे, वही अब एक ऐसे सफर पर खर्च हो गए, जो कभी पूरा ही नहीं हो पाया।

सतबरवा निवासी प्रकाश कुमार उर्फ ददन ने कहा,
“यह घटना पूरे इलाके के लिए बेहद दुखद है। किसी के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए। पूरा क्षेत्र शोक में डूबा हुआ है।”

यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि एक पूरे परिवार के भविष्य का बिखर जाना है।

एक बड़ा सवाल: क्या बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं इस त्रासदी को रोक सकती थीं?

परिवार का कहना है कि अगर रांची या आसपास बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध होतीं, तो शायद संजय को एयरलिफ्ट करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

यह घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है—
क्या भारत के हर हिस्से में गंभीर मरीजों के लिए पर्याप्त और उन्नत चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं?

क्यों आज भी लोगों को इलाज के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर जाना पड़ता है?

पीछे रह गईं सिर्फ यादें और अधूरे सपने

आज चंदवा में सन्नाटा है। हर आंख नम है। हर दिल में दर्द है।
संजय प्रसाद, जो अपने परिवार के सहारे थे, अब सिर्फ यादों में रह गए हैं। उनके बच्चे अब अपने माता-पिता के साये के बिना बड़े होंगे।
उनकी पत्नी, जो हर मुश्किल में उनके साथ थीं, उसी आखिरी सफर में हमेशा के लिए बिछड़ गईं।

यह घटना हमें याद दिलाती है कि जिंदगी कितनी अनिश्चित है—और एक परिवार का संघर्ष कितना गहरा हो सकता है।

एक होटल की आग से शुरू हुई यह कहानी, आसमान में खत्म हो गई।
लेकिन पीछे छोड़ गई दर्द, सवाल और एक ऐसी खामोशी, जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।

“नौकरी नहीं तो फीस वापस?” — राघव चड्ढा के सवाल से भड़की बहस

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *