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प्लास्टिक को दुश्मन नहीं, जिम्मेदारी से उपयोग करना ही समाधान: आई ई टी, लखनऊ में विशेषज्ञ व्याख्यान

आज के दौर में प्लास्टिक को पर्यावरण के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जाता है, लेकिन क्या प्लास्टिक को पूरी तरह खत्म करना ही समाधान है? इसी महत्वपूर्ण प्रश्न का जवाब खोजने के लिए इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, लखनऊ में “Sustainability, Engineering and Circular Economy: Driving Innovation and Entrepreneurship in Plastic & Polymeric Products” विषय पर एक विशेषज्ञ व्याख्यान आयोजित किया गया। इस सत्र ने छात्रों और शिक्षकों को यह समझाया कि प्लास्टिक समस्या नहीं है, बल्कि उसका गैर-जिम्मेदार उपयोग समस्या है।

सतत भविष्य के लिए इंजीनियरिंग की भूमिका पर जोर

कार्यक्रम का उद्घाटन संस्थान के निदेशक प्रो. विनीत कंसल ने किया। उन्होंने अपने उद्घाटन संबोधन में कहा कि आज इंजीनियरिंग केवल उत्पाद बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास सुनिश्चित करना भी इंजीनियरों की जिम्मेदारी है।

रसायन इंजीनियरिंग विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. आर. पी. राम ने कार्यक्रम के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए बताया कि सर्कुलर इकोनॉमी का मॉडल भविष्य की औद्योगिक व्यवस्था का आधार बनने जा रहा है, जिसमें संसाधनों का अधिकतम उपयोग और न्यूनतम अपशिष्ट सुनिश्चित किया जाता है।

प्लास्टिक का बहिष्कार नहीं, जिम्मेदार उपयोग है समाधान

इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान (IITR), लखनऊ के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. वी. पी. शर्मा ने छात्रों को संबोधित किया। उन्होंने सतत विकास और सर्कुलर इकोनॉमी की अवधारणाओं को सरल और व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से समझाया।

प्रो. शर्मा ने कहा—

“प्लास्टिक को पूरी तरह खत्म करना व्यावहारिक समाधान नहीं है। असली समाधान है—प्लास्टिक का जिम्मेदार उपयोग, बेहतर डिजाइन और प्रभावी रीसाइक्लिंग।”

उन्होंने बताया कि रासायनिक अभियांत्रिकी में किसी भी प्रक्रिया की व्यवहार्यता (Feasibility), दक्षता (Efficiency) और शुद्धता (Purity) सबसे महत्वपूर्ण होती है। यदि इन तीनों पहलुओं को ध्यान में रखकर उत्पाद डिजाइन किया जाए, तो पर्यावरण पर उसके नकारात्मक प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

“Cradle to Cradle” मॉडल: प्रकृति से सीखने का नया दृष्टिकोण

व्याख्यान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था “Cradle to Cradle” की अवधारणा, जिसे प्रो. शर्मा ने बायोमिमेटिक यानी प्रकृति से प्रेरित डिजाइन का मॉडल बताया।

इस मॉडल का मुख्य सिद्धांत है—

यह मॉडल न केवल पर्यावरण संरक्षण में सहायक है, बल्कि नए स्टार्टअप और उद्यमिता के अवसर भी पैदा करता है।

छात्रों को नवाचार और उद्यमिता के लिए प्रेरित किया

प्रो. शर्मा ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि भविष्य उन्हीं इंजीनियरों का होगा जो तकनीकी ज्ञान के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी को भी समझेंगे। उन्होंने छात्रों को प्लास्टिक और पॉलिमर के क्षेत्र में ग्रीन टेक्नोलॉजी, रीसाइक्लिंग समाधान और सतत उत्पाद डिजाइन पर काम करने के लिए प्रेरित किया।

सत्र के अंत में आयोजित प्रश्नोत्तर कार्यक्रम में छात्रों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और अपने प्रश्नों के माध्यम से विषय की गहराई को समझा।

शिक्षकों और अधिकारियों की गरिमामयी उपस्थिति

इस कार्यक्रम में रसायन इंजीनियरिंग विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. आर. पी. राम सहित डीन एकेडमिक प्रो. संजय श्रीवास्तव, सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रदीप कुमार, इन्क्यूबेशन सेंटर मैनेजर श्री संदीप कुमार, श्री धीरज वर्मा सहित कई शिक्षक और छात्र उपस्थित रहे।

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल

यह विशेषज्ञ व्याख्यान केवल एक शैक्षणिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह एक जागरूकता अभियान भी था, जिसने छात्रों को यह समझाया कि इंजीनियरिंग और नवाचार के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण संभव है।

आज जब पूरी दुनिया प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या से जूझ रही है, ऐसे में इस प्रकार के कार्यक्रम भविष्य के इंजीनियरों को न केवल समाधान खोजने के लिए प्रेरित करते हैं, बल्कि उन्हें पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनने की दिशा में भी मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

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