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“नौकरी नहीं तो फीस वापस?” — राघव चड्ढा के सवाल से भड़की बहस, क्या सरकारी भर्ती परीक्षा फीस बन गई है कमाई का जरिया

देश में बढ़ती बेरोजगारी और सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या के बीच भर्ती परीक्षा फीस को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद Raghav Chadha ने सरकारी भर्ती परीक्षाओं की फीस संरचना पर गंभीर सवाल उठाते हुए पूछा है कि जब सरकार पर्याप्त नौकरियां नहीं दे पा रही है, तो लाखों अभ्यर्थियों से ली गई परीक्षा फीस को रिफंड करने पर विचार क्यों नहीं किया जाता।

उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर “नौकरी नहीं तो फीस रिफंड” की मांग जोर पकड़ रही है और लाखों प्रतियोगी छात्र इस मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रख रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

राघव चड्ढा ने कहा कि देश में हर साल सरकारी नौकरियों के लिए लाखों युवा आवेदन करते हैं। हर आवेदन के साथ उम्मीदवारों से ₹100 से ₹1500 तक परीक्षा फीस ली जाती है। लेकिन अंत में उपलब्ध पदों की संख्या बेहद कम होती है, जिससे अधिकांश उम्मीदवारों को नौकरी नहीं मिल पाती।

उन्होंने सवाल उठाया कि:

“अगर सरकार लाखों उम्मीदवारों से फीस लेकर भी उन्हें रोजगार नहीं दे पा रही है, तो क्या यह उचित नहीं होगा कि उनकी फीस वापस की जाए?”

उन्होंने यह भी पूछा कि क्या सरकार भर्ती परीक्षा फीस को एक तरह के राजस्व स्रोत के रूप में इस्तेमाल कर रही है।

लाखों उम्मीदवार, लेकिन पद बहुत कम

भारत में सरकारी नौकरी के लिए प्रतिस्पर्धा बेहद कठिन हो चुकी है। उदाहरण के तौर पर:

इसका मतलब है कि चयन दर 1% से भी कम रहती है। बाकी 99% उम्मीदवारों की फीस वापस नहीं होती।

छात्रों पर आर्थिक बोझ बढ़ता जा रहा है

एक प्रतियोगी छात्र एक साल में कई परीक्षाओं के लिए आवेदन करता है। जैसे:

इस तरह एक छात्र साल भर में ₹5000 से ₹15000 तक फीस पर खर्च कर देता है। आर्थिक रूप से कमजोर और ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए यह एक बड़ा वित्तीय बोझ बन जाता है।

भर्ती प्रक्रिया में देरी और परीक्षा रद्द होने से बढ़ती नाराजगी

कई बार भर्ती परीक्षाएं वर्षों तक लंबित रहती हैं या पेपर लीक होने के कारण रद्द कर दी जाती हैं। ऐसे मामलों में उम्मीदवारों को न तो नौकरी मिलती है और न ही उनकी फीस वापस होती है।

हाल के वर्षों में कई भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और देरी की घटनाओं ने छात्रों के बीच नाराजगी को और बढ़ा दिया है।

सोशल मीडिया पर छात्रों का समर्थन

राघव चड्ढा के बयान के बाद सोशल मीडिया पर हजारों छात्रों ने अपनी प्रतिक्रिया दी। कई छात्रों ने कहा कि यह मुद्दा उनकी वास्तविक समस्या को दर्शाता है।

कुछ छात्रों का कहना है कि सरकार को कम से कम उन मामलों में फीस रिफंड करनी चाहिए जहां:

हालांकि कुछ लोगों ने इसे राजनीतिक बयान बताते हुए कहा कि परीक्षा फीस प्रशासनिक खर्चों को पूरा करने के लिए जरूरी होती है।

सरकार परीक्षा फीस क्यों लेती है?

सरकार और भर्ती एजेंसियों का कहना है कि परीक्षा आयोजित करने में कई प्रकार के खर्च होते हैं, जैसे:

इसी कारण परीक्षा फीस को application processing charge माना जाता है, जो सामान्यतः non-refundable होती है।

क्या भविष्य में बदल सकती है नीति?

विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे पर सरकार कुछ सुधार कर सकती है, जैसे:

हालांकि पूरी तरह से फीस रिफंड की नीति लागू करना फिलहाल मुश्किल माना जा रहा है।

युवाओं की वास्तविक चिंता या राजनीतिक बहस?

सरकारी भर्ती परीक्षा फीस का मुद्दा केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि लाखों युवाओं की वास्तविक चिंता से जुड़ा हुआ है। बेरोजगारी, सीमित नौकरियां और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भर्ती प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और छात्र-हितैषी बनाया जा सकता है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है और क्या भविष्य में भर्ती प्रणाली में कोई बदलाव किया जाता है।

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